सेना दिवस 2019- भारतीय सेना के द्वारा अंजाम दिया गया कुछ बेहतरीन और चौंका देने वाले मिशन

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बीते 15 जनवरी को देश भर में 71 वां सेना दिवस (Army Day) मनाया गया। वैसे तो भारतीय सेना हम सब के लिए बहुत गर्व का विषय हैं ही, पूरे विश्व भी उसका लोहा मानती हे। भारतीय सेना दुनिआ की दूसरी सबसे बड़ी थलसेना हे और सिर्फ़ चीन के पास ही हमसे ज़्यादा थलसैनिक हैं। आज हम भारतीय सेना के द्वारा अंजाम दिए गए कुछ उन लड़ाई पर बात करेंगे जिसको जान कर आप सेना के पराक्रम पर और ज़्यादा गौरव महसूस करने लगेंगे। वैसे इन लम्हों को याद करने से पहले यह जानना ज़रूरी हे की हम सेना दिवस क्यों मानते हैं।

15 जनवरी 1949 को फील्ड मार्शल KM करिअप्पा ने पहले भारतीय के तौर पर C-in-C यानी कमांडर इन चीफ का पद संभाला था। उससे पहले यह पद हमेशा ब्रिटिश जेनेरेल्स ही सँभालते आ रहे थे। यहाँ पर हम आपको यह बता दें की जनरल करिअप्पा को उनके बेहतरीन योगदान के लिए फील्ड मार्शल (भारतीय सेना के सबसे बड़ा पद जो की 5 स्टार रैंक की होती हे जो आजतक बस दो लोगों को मिली हे) की उपाधि 1986 में मिला, उनके रिटायर होने के करीब 23 साल बाद। जनरल करिअप्पा ने C-in-C का पद सँभालने से पहले भारतीय सेना के वेस्टर्न कमांड के चीफ थे और उन्हीके नेतृत्व में भारतीय सेना ने कश्मीर में पाकिस्तानी कबिलियों और सेना को कश्मीर पर कब्ज़ा करने से रोका था। C-in-C बनने के बाद करिअप्पा ने सेना में किसी भी तरह के राजनितिक दखल से साफ़-साफ़ मना करदिया यहाँ तक की इसी बात को लेकर नेहरू से अनबन होने के कारण वह अपना इस्तीफा देने के कगार पर थे। वह सेना को एक नेशनल आर्मी बनाना चाहते थे ना की एक इम्पीरियल आर्मी। उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज का नारा “जय हिन्द” को भारतीय सेना में अभिबादन के रूप में लागू किया। वह सेना में किसी भी तरह के आरक्ष्यण के खिलाफ थे और उन्ही के वजह से आज तक SC ST आरक्ष्यण सेना में भर्ती के दौरान लागू नहीं होता। इसके अलावा उन्होंने टेरीटोरियल आर्मी, आल इंडिया रेजिमेंट (Brigade of the Guards) और पैराशूट रेजिमेंट जैसे कई नए यूनिट की शुरुवात की जो आगे जाकर भारतीय सेना के लिए बहुत मददगार साबित हुए।

ये तो बात हुई आर्मी डे की इतिहास की। आईये अभी नजर डालते हे भारतीय सेना के कुछ गौरवपूर्ण लम्हो पर

1. 16 December 1971, भारत पाकिस्तान युद्ध , ढाका ,बांग्लादेश

यह दिन विश्व के इतिहास में खास कर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के इतिहास में हमेशा सबसे महत्त्वपूर्ण दिन के हिसाब से जाना जायेगा। इसी दिन भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके पूर्वी पाकिस्तान को एक अलग देश, बांग्लादेश, बनाया। निशन्देह यह भारतीय सेना के लिए सबसे गौरवपूर्ण क्षण हे। पाकिस्तान के निरंतर अत्याचार के चलते बहुत बांग्लादेशी भारत में शरणार्थी के तौर पर घुसने लगे थे। एक क्षण ऐसा आया की इंदिरा गाँधी जी ने अप्रैल 1971 के आसपास यह निर्णय किया की भारत अब और भार नहीं उठा सकता और तब के सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशॉ को पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध करने के लिए तैयार रहने के आदेश दिए । तब जनरल ने सीधा-सीधा मना करदिया और कहा अगर आपको अगर युद्ध में लड़ना हे तो अभी लड़ाई शुरू की जा सकती हे मगर आपको अगर युद्ध जितना हे तो आप मानसून ख़तम होने का इंतज़ार करिये। जनरल मानेकशॉ के नेतृत्व में भारत ने बस 14 दिनों में पाकिस्तान को पूर्व और पश्चिम दोनों मोर्चे में धराशायी करदिया था। 90000 के करीब पाकिस्तानी सैनिक और अर्धसैनिक भारतीय सेना के सामने घुटने टेके और आत्मसमर्पण किया। जनरल मानेकशॉ को इसी कामयाबी के लिए फील्ड मार्शल के उपाधि से नवाजा गया। मानेकशॉ के अलावा ये उपाधि आज तक बस जनरल करियप्पा को ही प्राप्त हुई हे।

2. बैटल ऑफ़ अस्सल उत्तर ,भारत पाकिस्तान युद्ध ,8-10 सितम्बर 1965, पंजाब,भारत

भारतीय सेना के इतिहास में यह युद्ध बहुत मायने रखता हे। 1962 में भारत की चीन के हाथो शर्मनाक हार के बाद सेना का मनोबल बहुत निचे था। इसके साथ-साथ नेहरू जी की मृत्यु और आर्थिक संकट के साथ-साथ दक्षिण में एंटी हिन्दी मूवमेंट के चलते पूरे भारत में माहौल बहुत संवेदनशील था और भारत के अखंडता पर संकट के बादल छाए हुए थे। इसका फायदा लेते हुए पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया यह सोच कर की कश्मीर की जनता उसके साथ खड़ी रहेगी और भारत को आसानी से परास्त किया जा सकेगा। पर हुआ इसका ठीक उलट । भारतीय सेना ने न केवल उत्तर में पाकिस्तानियों को कश्मीर से लताड़ा बल्कि पंजाब के रास्ते दक्षिण में भी लाहौर तक कब्ज़ा कर लिया। भारत के लिए ये करो या मारो वाली लड़ाई थी। इसके जवाब में पाकिस्तान ने पंजाब के तरनतारन के रस्ते अपने अत्याधुनिक अमेरिकी टैंकों को लेकर भारतीय सिमा में घुसना शुरू किया। पाकिस्तानी आक्रमण को रोकने के लिए भारतीय सेना जी जान से लड़ी और तुलनात्मक रूप से तकनिकी कमजोर वाले टैंकों से उसका सामना किया। आशा के विपरीत भारतीय सेना को यहाँ अभूतपूर्व सफलता हासिल हुई। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 99 टैंक ध्वंस करदिये और बदले में बस 10 टैंक गवाई। इस युद्ध को द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ी टैंक बैटल के रूप में भी जाना जाता हे। ये घटना इस बात को दर्शाती हे की तकनिकी रूप में ज़्यादा आधुनिक हतियार होने के बावजूत दुश्मन को हराया जा सकता हे। इस युद्ध के नायक वीर अब्दुल हमीद को परमवीर चक्र से भी नवाजा गया था।

3. ऑपरेशन मेघदूत , 1984, सियाचिन ग्लेशियर , भारत

भले ही भारत पाकिस्तान के 1948 के युद्ध के बाद नियंत्रण रेखा (LOC) को दोनों देशों ने अपने बॉर्डर के तौर पर मान लिया था पर ये रेखा सियाचिन ग्लेशियर से पहले ही ख़तम हो जाती थी। बर्फीला और बहुत ऊंचाई के कारण कोई भी देश इस इलाके को किसी काम का नहीं मानता था। इलसिए किसीने इसके प्रति ध्यान केंद्रित नहीं किया। लेकिन 1984 आते आते बेहतर तकनिकी उन्नति के कारन सियाचिन ग्लेशियर पहुंचना अभी नामुमकिन नहीं था। इसकी ऊंचाई के कारन यह दोनों देशों केलिए रणनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण जगह बन चुकी थी। पाकिस्तान ने इसको हतियाने के लिए अपना प्रोग्राम बनाया और अपने आर्मी को इसकी चढ़ाई के लिए ट्रैन किया। भारत को यह जानकारी गुप्तचरों के हाथों पता चली और भारत ने पाकिस्तान के वहां पहुँचने से पहले सियाचिन पर कब्ज़ा करने के लिए अपने योजना बनायीं। लेफ्टनेंट जनरल प्रेमनाथ हुन के नेतृत्व में भारतीय सेना ने ६ हजार मीटर ऊंचाई को लांघने का काम शुरू किया। सियाचिन के ज्यादातर हिस्सों पे पाकिस्तान पहले से कब्ज़ा करचुका था पर चोटिओं पर अब भी वह पहुंचा नहीं था। भारतीय सेना सियाचिन के चार में से तीन चोटिओं पर सबसे पहले पहुंची और आसपास में रह रहे पाकिस्तानियों को वहां से खदेड़ते हुए भारत का झंडा लहराया। बाना पोस्ट को पाकिस्तान अपने कब्जे में रखा हुआ था जिसको वीरता पुर्बक बाना सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान से छीना। बाना पोस्ट का नाम सूबेदार बाना सिंह ने नाम पे रखा गया और उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया। आज भी यह युद्ध दुनिया में सबसे ऊंचाई पर होने वाला युद्ध के तौर पर माना जाता हे।

4. कारगिल वॉर , 1999, कारगिल, भारत

1965 की तरह इस बार भी पाकिस्तान ने कश्मीर को हतियाने के लिए धोके से कारगिल के चोटिओं पर कब्ज़ा करलिया जब ठण्ड के कारण दोनों देश के सेना चोटियों की हिफाजत करना बंद कर देते हैं। भारत के प्रधानमंत्री वाजपेयी अभी अभी लाहौर से धमाकेदार स्वागत के बाद लौटे थे और यह सबके लिए अकल्पनीय था की पाकिस्तान इतनी जल्दी भारत पर आक्रमण करलेगा। परमाणु परिक्षण के चलते इंटरनेशनल कम्युनिटी में सब भारत के खिलाफ खड़े थे। इसलिए भारत 1965 की तरह एक कन्वेंशनल वॉर करने के परिस्थिति में नहीं था। भारत में जनरल इलेक्शन की भी तैयारी चल रही थी और इसलिए भारत पाकिस्तान के ऊपर सीधा आक्रमण पंजाब या राजस्थान के रास्ते नहीं करसकता था। ये लड़ाई इसलिए बहुत मुश्किल बनचुकी थी क्यों की सारी चोटियां कम से कम पांच हज़ार ऊंचाई पर थे और चोटी तक पहुँचने के लिए कोई रस्ते नहीं थे। बस पर्वत चढ़कर ही जाना एक मात्र जरिया था। सारे चोटियां पाकिस्तान के सेना कब्ज़ा करके बैठी थी और उसका निशाना NH-1 को तोडना था जो की श्रीनगर को लदाख के साथ जोड़ती हे। इसके जरिये पाकिस्तान भारतीय सेना के सप्लाई को रोक कर भारत के साथ कारगिल के बदले सियाचिन का सौदा करने के मूड में था विजिबिलिटी कम होने के कारण वायुसेना चोटियों पर आक्रमण नहीं कर सकती थी और बोफोर्स जैसे अर्टिलरी भी निशाना चूक जाते थे। इसलिए चोटियों को क़ज़ा करने के लिए सेना के पास पैदल चढ़ने के अलावा और कोई चारा नहीं था। दिन में चढ़ाई नहीं हो सकती थी क्यों की पाकिस्तानी आर्मी की पैनी नजर थी, इसलिए चढ़ाई रात को होती थी। इसी मुश्किल हालत में चढ़ाई करते हुए सेना ने कारगिल में सारे चोटियों पर कब्ज़ा किया और पाकिस्तानियों को वहां से खदेड़ा। इसके बदले भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ी। भारत के करीब पांचसौ से ज्यादा सैनिक सहीद हुए। ऋतिक रोशन की मूवी लक्ष्य इसी तरह के एक चोटि को कब्ज़ा करने की कहानी के ऊपर आधारित हे।

5. बैटल ऑफ़ लोंगेवाला, भारत पाकिस्तान युद्ध 1971, राजस्थान , भारत

यह युद्ध पाकिस्तान के सामरिक इतिहास में सबसे शर्मनाक पल के रूप में जाना जाता हे जब महज 120 भारतीय सैनिकों ने सिर्फ राइफल के सहारे टैंकों के साथ आए दो से तीन हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों को एक रात तक रोक के रखा था। सुबह होते ही एयरफोर्स आकर बचे कूचे पाकिस्तानियों को वहां से साफ़ करदिया। पाकिस्तानी ये ठान के आए थे की सुबह का नास्ता जैसलमेर में, दोपहर का खाना जोधपुर में और रात का दिल्ली में करेंगे। लेकिन बड़े अरमानों के साथ आयी पाकिस्तानी फ़ौज को भारतीयों सेना के हाथो मुकि खानी पड़ी थी। 1997 में आयी फिल्म बॉर्डर इसी युद्ध पर आधारित हे।

6. बैटल ऑफ़ नाथू ला एंड चौ ला , 1967 , सिक्किम और भूटान और चीन बॉर्डर

सन 1962 में चीन के हाथों शिकस्त मिलने के बाद भारत के सेना का छवि देश के जनता के सामने थोड़ी धुंदली पड़गयी थी। इसके बाद 1965 युद्ध जीत कर सेना का मनोबल में इजाफा हुआ था। 1967 में चीन ने फिर से दुःसाहस करते हुए सिक्किम (उस समय सिक्किम अलग देश हुआ करता था ) के पास भारतीय सेना के टुकड़ियों पर अचानक हमला किया। इसमें करीब 70 भारतीय जवान सहीद हो गए। इसके जवाब में भारतीय सेना ने चीनियों पर जमकर हमला बोला और करीब तीन शो चीनी सैनकों को मौत के घाट उतार दिया और जवाब में एक भी भारतीय सैनिक घायल तक नहीं हुआ। इस युद्ध के बाद चीन का अति आत्मविश्वास ख़तम हुआ और उसके बाद से चीन कभी भी भारतीय सेना के साथ हटियारबन्द युद्ध करने से कतराता रहा। इसके जरिये भारतीय सेना ने थोड़ी ही सही 1962 के हार का बदला लिया।

7. सर्जिकल स्ट्राइक , सितम्बर 29 ,2016, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर , पाकिस्तान

पाकिस्तानी सेना ने देर रात आंतकवादिओं द्वारा भारतीय सेना के कैंप के ऊपर हमला किया। उसी समय ज्यादातर सैनिक सो रहे थे और भारत ने अपने अठरह जवान खो दिए। हलाकि सारे आतंकवादी वहीँ के वही मारे गए ,फिर भी सेना के अंदर जबरदस्त गुस्सा था और सेना ने ग्यारह दिन बाद पाकिस्तान में घुसकर पाकिस्तान में ट्रेनिंग ले रहे आतंकवादियों और उनके आकाओं का सफाया कर दिया। अगर उस समय के सेनाध्यक्ष जनरल सुहाग की माने तो ये भारतीय सेना द्वारा की गयी इस तरह की पहली कारवाही थी। इसलिए इसको पाकिस्तान ऊपर भारत का पहला सर्जिकल स्ट्राइक के तौर पर भी जाना जाता हे। 2019 में आयी फिल्म ” उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक ” इसी घटना पर आधारित हे।

तो ये थे भारतीय सेना के द्वारा अंजाम दिए गए कुछ पराक्रमी लम्हें । हलाकि बहुत सारे घटनाओं में से मेने कुछ चुनिंदों का ही यहाँ पे वर्णन किया हे। इसका किसी भी तरह से यह मतलब नहीं की बाकि ऑपरेशन्स किसी लिहाज से फीके हों। भारतीय होने के नाते मुझे हर सैनिक पर बराबर गर्व हे और ये चुनिंदे घटनाये पूरी तरह से मेरा निजी चॉइस हे। अगर आप को कोई और घटनाये पता हो और आप साझा करना चाहते हे तो आपका स्वागत हे।

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