केंद्र सरकार का ऐतिहासिक फैसला, अपने ही देश में पच्चीस साल से शरणार्थी बनकर रह रहे इस जनजाति का पुनर्वास करेगी सरकार

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भारत के गृह मंत्रालय ने बृहस्पतिवार को यह नोटिफिकेशन जारी करते हुए बताया की 23 साल से चले आ रहे “मिज़ो” और “ब्रू” जनजाति के बीच के तनाव को सुलझा लिया गया हे। इसमें सारे अंशीदारों ने अपना दस्तखत किये हैं।

आखिर क्या हे ये तनाव

भारत का नार्थ ईस्ट इलाका हमेशा ही बहुत संवेदनशील माना जाता हे। हज़ारो छोटे छोटे जनजाति यहाँ पर सालों से बसे हुए हैं , हर एक जनजाति का रहन सहन, खान पान , संस्कृति , धरम अलग अलग हे। इन्ही में से एक जनजाति हे “ब्रू ” जनजाति। सालों से यह जनजाति मिजोरम और त्रिपुरा के बॉर्डर इलाके में रहते आ रहे हैं। मिजोरम में मिज़ो जनजाति सबसे ज्यादा तादाद में हैं और वे ब्रू जनजाति को अपने से अलग और अक्सर बाहरी मानते आ रहे हैं। मिज़ो जनजाति के लोग प्रायतः क्रिस्चियन हैं और ज्यादातर ब्रू जनजाति के लोग हिन्दू हैं। परन्तु यह झगड़ा सांप्रदायिक काम और जनजातिक ज्यादा हे। 1995 में मिज़ो स्टूडेंट एसोसिएशन ने ब्रू लोगों के नागरिकता और वोट देने का अधिकार छीनने की मांग की और आंदोलन शुरू किया।अक्सर आम जिंदगी में भेदवाव और प्रताड़ना के शिकार हुए ब्रू जनजाति ने खुद की हक़ की लड़ाई के लिए ब्रू नेशनल लिबरेशन फ्रंट (BNLF) नामक एक चरमपंथी संघठन की स्थापना की और मिजोरम में अपने जनजाति के लिए ऑटोनोमस डिस्ट्रिक कौंसिल की मांग की। मिज़ो लोग इसके शाक्त खिलाफ थे और इस वजह से तनाव और बढ़ता गया। 1997 में BNLF के कुछ चरमपंथियों ने मिज़ो जनजाति के एक वन अधिकारी की हत्या करदी थी। इसके बाद मिजोरम में दंगे भड़क उठे और बहुत सारे ब्रू लोगों के घर जला दिए गए और काफी ब्रू लोगों को अपनी जान भी गावनि पड़ी। इसके बाद से ही करीब 30000 ब्रू मिजोरम छोड़ कर त्रिपुरा में शरणार्थी बन कर रह रहे हैं। इसी तरह ब्रू लोग करीब पच्चीस सालों से अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रह रहे थे। यह कहानी लगभग उसी तरह की हे जैसे कश्मीरी पंडितों को अपना घर बार छोड़ कर अपने ही देश में शरणार्थी बन कर रहना पद रहा हे।

पहले भी होते रहे हैं ब्रू जनजाति के पुनर्वास के प्रयास

ब्रूओं को मिजोरम में बसाने के लिए बहुत बार प्रयास हुए। परंतु कोई भी प्रयास सफल नहीं हुई। इसके दो बड़े वजह थें। एक, मिजोरम के मिज़ो जनजाति यह नहीं चाहते थे की ब्रू लोग उनके राज्य में आएं। दूसरा, ब्रू डर रहे थे की मिजोरम जायेंगे तो कहीं उनको फिर से प्रताड़ना का शिकार ना होना पड़े। इसके समाधान के लिए केंद्र सरकार कई बार ब्रू लोगों को त्रिपुरा में हीं बसाने के प्रयास करती रही परन्तु त्रिपुरा सरकार हमेशा इसके खिलाफ रही क्यों की वह यह मानती थी की ब्रू जनजाति त्रिपुरा के स्थानीय जनजाति नहीं हैं। और इसलिए इस प्रस्ताव को लागु होने नहीं दिया। इसी तरह से ब्रू जनजाति के लोग अपने ही देश में बेघर हो गए और उनके पास अपना कोई राज्य कहने के लिए कुछ बचा नहीं था। इसके चलते ब्रू जनजाति को अपने वोट डालने के लिए काफी मुश्किलें आती थी और अक्सर वह अपना वोट नहीं दाल पाते थे। क्यों की इसके लिए उनको मिजोरम जाना जरुरी था और उसमे जान का खतरा था। हालांकि चुनाव आयुक्त शरणार्थी शिविर में विशेष व्यवस्था करती थी फिर भी ज्यादातर ये वोटिंग निष्पक्ष और सही तरीके से हो नहीं पा रही थी।

कैसे सुलझा मुद्दा

जनवरी 2017 में ब्रू लोगों का एक संस्था ब्रू हिन्दू जॉइंट कोआर्डिनेशन कमिटी ने गृह मंत्रालय को पत्र लिख कर ये मांग किया की उनके आस्था और संस्कृति का सुरक्ष्या के लिए केंद्र सरकार आवश्यक कदम उठाये। इसके साथ साथ भयबिहीन चुनाव माहौल बनाया जाये जिसके द्वारा सही तरीके से वह अपना वोट डाल सकें। इसके चलते चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव के दौरान विशेष बस की सुबिधा किया था और विस्थापित होने के बाद पहली बार ब्रू जनजाति अपना वोट मिजोरम में दाल सके। 2018 त्रिपुरा में भाजपा के सरकार आने के बाद त्रिपुरा सरकार ने ब्रू जनजाति के प्रति नरम रवैया अपनाया और अंततः जनवरी 2020 में उनको त्रिपुरा में स्थायी रूप में बसाने के लिए अपनी सहमति प्रदान किया। बीते 25 साल से त्रिपुरा के वामपंथी सरकार ब्रू जनजाति को त्रिपुरा में नागरिक के तौर पर बसाने के खिलाफ रही।

कैसे मदद करेगी सरकार

इस समझौते के तहत केंद्र सरकार ब्रू जनजाति को त्रिपुरा में बसाने का पूरा खर्चा खुद से उठाएगी। इसके लिए केंद्र सरकार करीब 600 करोड़ रुपये का अनुमोदन करेगी । हर ब्रू परिवार को 1200 स्क्वायरफ़ीट की जमीन प्रदान किया जायेगा और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनाने के लिए डेढ़ लाख रुपये का अनुमोदन मिलेगा। इसके अलावा हर परिवार के बैंक अकाउंट में चार लाख रुपये का फिक्स्ड डिपाजिट किया जायेगा और अगले दो साल तक हर माह पांच हजार रुपये की सहायता राशि दी जाएगी। दो साल तक सरकार सभी परिवार का राशन का खर्चा भी उठाएगी। जमीन खरीदने के लिए केंद्र सरकार त्रिपुरा सरकार को डेढ़ करोड़ रुपये का भुगतान भी करेगी।

क्या हे आगे की राह

अपने ही देश में अपनों के द्वारा अलग किये जाने के बाद ब्रू लोगों के कल्याण हेतु सरकार का यह कदम काफी सराहनीय हे। हम आशा यह करेंगे की ब्रू जनजाति के लोग मुक्ष्यधारा में शामिल हो कर देश के और अपने जनजाति के लोगों की बेहतरी के लिए अपना योगदान दें और पुरे भारतवासी उनका इस कार्य में सहयोग करें। इसके साथ साथ यह भी कामना करेंगे की आगे से कभी किसी भारतियों को कश्मीरी पंडितों जैसा या फिर ब्रू जनजाति जैसा अपने ही देश में शरणार्थी बन कर न रहना पड़े।

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